मौर्य काल में राजधानी पाटलिपुत्र में स्थित थी। प्रशासन को सुचारू रूप से चलने के लिए साम्राज्य को चार प्रमुख भागों में बांटा गया था। पूर्वी क्षेत्र की राजधानी तौसाली थी। उत्तरी क्षेत्र की राजधानी तक्षशिला थी जबकि पश्चिमी उज्जैन में स्थित थी। दक्षिणी क्षेत्र की राजधानी सुवर्णगिरी थी। मौर्य प्रशासन की जानकारी का मुख्य
प्राचीन भारतीय इतिहास : 1 – प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत
भारत के इतिहास के सम्बन्ध के अनेकों स्त्रोत उपलब्ध हैं, कुछ स्त्रोत काफी विश्वसनीय व वैज्ञानिक हैं, अन्य मान्यताओं पर आधारित हैं।प्राचीन भारत के इतिहास के सम्बन्ध में जानकारी के मुख्य स्त्रोतों को 3 भागों में बांटा जा सकता है, यह 3 स्त्रोत निम्नलिखित हैं :
पुरातात्विक स्त्रोत
साहित्यिक स्त्रोत
विदेशी स्त्रोत
(i) पुरातात्विक स्त्रोत (Archaeological Sources)
पुरातात्विक स्त्रोत का सम्बन्ध प्राचीन अभिलेखों, सिक्कों, स्मारकों, भवनों, मूर्तियों तथा चित्रकला से है, यह साधन काफी विश्वसनीय हैं। इन स्त्रोतों की सहायता से प्राचीन काल की विभिन्न मानवीय गतिविधियों की काफी सटीक जानकारी मिलती है। इन स्त्रोतों से किसी समय विशेष में मौजूद लोगों के रहन-सहन, कला, जीवन शैली व अर्थव्यवस्था इत्यादि का ज्ञान होता है। इनमे से अधिकतर स्त्रोतों का वैज्ञानिक सत्यापन किया जा सकता है। इस प्रकार के प्राचीन स्त्रोतों का अध्ययन करने वाले अन्वेषकों को पुरातत्वविद कहा जाता है।
अभिलेख (Inscriptions)
भारतीय इतिहास के सम्बन्ध में अभिलेखों का स्थान अति महत्वपूर्ण है, भारतीय इतिहास के बारे में प्राचीन काल के कई शासकों के अभिलेखों से काफी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। यह अभिलेख पत्थर, स्तम्भ, धातु की पट्टी तथा मिट्टी की वस्तुओं पर उकेरे हुए प्राप्त हुए हैं। इन प्राचीन अभिलेखों के अध्ययन को पुरालेखशास्त्र कहा जाता है, जबकि इन अभिलेखों की लिपि के अध्ययन को पुरालिपिशास्त्र कहा जाता है। जबकि अभिलेखों के अधययन को Epigraphy कहा जाता है। अभिलेखों का उपयोग शासकों द्वारा आमतौर पर अपने आदेशों का प्रसार करने के लिए करते थे।
यह अभिलेख आमतौर पर ठोस सतह वाले स्थानों अथवा वस्तुओं पर मिलते हैं, लम्बे समय तक अमिट्य बनाने के लिए इन्हें ठोस सतहों पर लिखा जाता है। इस प्रकार के अभिलेख मंदिर की दीवारों, स्तंभों, स्तूपों, मुहरों तथा ताम्रपत्रों इत्यादि पर प्राप्त होते हैं। यह अभिलेख अलग-अलग भाषाओँ में लिखे गए हैं, इनमे से प्रमुख भाषाएँ संस्कृत, पाली और संस्कृत हैं, दक्षिण भारत की भी कई भाषाओँ में काफी अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
भारत के इतिहास के सम्बन्ध में सबसे प्राचीन अभिलेख सिन्धु घाटी सभ्यता से प्राप्त हुए हैं, यह अभिलेख औसतन 2500 ईसा पूर्व के समयकाल के हैं। सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि अभी तक डिकोड न किया जाने के कारण अभी तक इन अभिलेखों का सार अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है। सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि में प्रतीक चिन्हों का उपयोग किया गया है, और अभी तक इस लिपि का डिकोड नहीं किया जा सका है।
पश्चिम एशिया अथवा एशिया माइनर के बोंगज़कोई नामक स्थान से भी काफी प्राचीन अभिलेख प्राप्त हुए हैं, हालांकि यह अभिलेख सिन्धु घाटी सभ्यता के जितने पुराने नहीं है।बोंगज़कोई से प्राप्त अभिलेख लगभग 1400 ईसा पूर्व के समयकाल के हैं। इन अभिलेखों की विशेष बात यह है कि इन अभिलेखों में वैदिक देवताओं इंद्र, मित्र, वरुण तथा नासत्य का उल्लेख मिलता है। ईरान से भी प्राचीन अभिलेख नक्श-ए-रुस्तम प्राप्त हुए हैं, इन अभिलेखों में प्राचीन काल में भारत और पश्चिम एशिया के सम्बन्ध में वर्णन मिलता है। भारत के प्राचीन इतिहास के अधययन में यह अभिलेख अति महत्वपूर्ण हैं, इनसे प्राचीन भारत की अर्थव्यवस्था, व्यापार इत्यादि के सम्बन्ध में पता चलता है।
ईरान में कस्साइट अभिलेख प्राप्त हुए हैं, जबकि सीरिया के मितन्नी अभिलेख में आर्य नामों का वर्णन किया गया है। मौर्य सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में काफी अभिलेख स्थापित किये। ब्रिटिश पुरातत्वविद जेम्स प्रिन्सेप ने सबसे पहले 1837 में अशोक के अभिलेखों को डिकोड किया। यह अभिलेख सम्राट अशोक द्वारा ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण करवाए गए थे। अभिलेख उत्कीर्ण करवाने का मुख्य उद्देश्य शासकों द्वारा अपने आदेश को जन-सामान्य तक पहुँचाने के लिए किया जाता था।
सम्राट अशोक के अतिरिक्त अन्य शासकों ने भी अभिलेख उत्कीर्ण करवाए, यह अभिलेख सम्राट द्वारा किसी क्षेत्र पर विजय अथवा अन्य महत्वपूर्ण अवसर पर उत्कीर्ण करवाए जाते थे। प्राचीन भारत के सम्बन्ध कुछ महत्वपूर्ण अभिलेख इस प्रकार हैं – ओडिशा के खारवेल में हाथीगुम्फा अभिलेख, रूद्रदमन द्वरा उत्कीर्ण किया गया जूनागढ़ अभिलेख, सातवाहन शासक गौतमीपुत्र शातकर्णी का नासिक में गुफा में उत्कीर्ण किया गया अभिलेख, समुद्रगुप्त का प्रयागस्तम्भ अभिलेख, स्कंदगुप्त का जूनागढ़ अभिलेख, यशोवर्मन का मंदसौर अभिलेख, पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख, प्रतिहार सम्राट भोज का ग्वालियर अभिलेख तथा विजयसेन का देवपाड़ा अभिलेख।
अधिकतर प्राचीन अभिलेखों में प्राकृत भाषा का उपयोग किया गया है, अभिलेख सामान्यतः उस समय की प्रचलित भाषा में खुदवाए जाते थे। कई अभिलेखों में संस्कृत भाषा में भी सन्देश उत्कीर्ण किये गए हैं। संस्कृत का उपयोग अभिलेखों में ईसा की दूसरी शताब्दी में दृश्यमान होता है, संस्कृत अभिलेख का प्रथम प्रमाण जूनागढ़ अभिलेख से मिलता है, यह अभिलेख संस्कृत भाषा में लिखा गया था। जूनागढ़ अभिलेख 150 ईसवी में शक सम्राट रूद्रदमन द्वारा उत्कीर्ण करवाया गया था। रूद्रदमन का शासन काल 135 ईसवी से 150 ईसवी के बीच था।
सिक्के (Coins)
प्राचीन काल में लेन-देन के लिए उपयोग की जाने वाली वस्तु विनिमय व्यवस्था (Barter System) के बाद सिक्के प्रचलन में आये। यह सिक्के विभिन्न धातुओं जैसे सोना तांबा, चाँदी इत्यादि से निर्मित किये जाते थे। प्राचीन भारतीय सिक्कों की एक विशिष्टता यह है कि इनमे अभिलेख नहीं पाए गए हैं। आमतौर प्राचीन सिक्कों पर चिह्न पाए गए हैं। इस प्रकार से सिक्कों को आहत सिक्के कहा जाता है। इन सिक्कों का सम्बन्ध ईसा से पहले 5वीं सदी से है। उसके पश्चात् सिक्कों में थोडा बदलाव आया, इन सिक्कों में तिथियाँ, राजा तथा देवताओं के चित्र अंकित किये जाने लगे। आहत सिक्कों के सबसे प्राचीन भंडार पूर्वी उत्तर प्रदेश तथा मगध से प्राप्त हुए हैं। भारत में स्वर्ण मुद्राएं सबसे पहले हिन्द-यूनानी शासकों ने जारी की, और इन शासकों ने सिक्कों के निर्माण में “डाई विधि” का उपयोग किया। कुषाण शासकों द्वारा जारी की गयी स्वर्ण मुद्राएं सबसे अधिक शुद्ध थी। जबकि गुप्त शासकों द्वारा सबसे ज्यादा मात्र में स्वर्ण मुद्राएं जारी की। सातवाहन शासकों ने सीसे की मुद्राएं जारी की।
प्राचीन भारत की जानकारी के लिए अन्य उपयोगी पुरातात्विक स्त्रोत
अभिलेख एवं सिक्कों से प्राचीन काल के सम्बन्ध में काफी सटीक जानकारी प्राप्त होती है। लेकिन अभिलेखों और सिक्कों के अलावा अन्य महत्वपूर्ण स्त्रोत भी हैं जिनसे प्राचीन काल के सम्बन्ध में उपयोगी जानकारी प्राप्त होती है, इन स्त्रोतों में इमारतें, मंदिर, स्मारक, मूर्तियाँ, मिट्टी से बने बर्तन तथा चित्रकला प्रमुख है।
प्राचीनकाल की वास्तुकला की जानकारी के लिए इमारतें जैसे मंदिर व भवन काफी उपयोगी स्त्रोत हैं। वास्तुकला की जानकारी के साथ-साथ इन इमारतों से उस समय की सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक व्यवस्था की भी जानकारी मिलती है।
प्राचीन भारत की जानकारी के सम्बन्ध में स्मारक अति महत्वपूर्ण है, इन स्मारकों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है – देशी तथा विदेशी स्मारक। देशी स्मारकों में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, नालंदा, हस्तिनापुर प्रमुख हैं। जबकि विदेशी समारकों में कंबोडिया का अंकोरवाट मंदिर, इंडोनेशिया में जावा का बोरोबुदूर मंदिर तथा बाली से प्राप्त मूर्तियाँ प्रमुख हैं। बोर्नियों के मकरान से प्राप्त मूर्तियों में कुछ तिथियाँ अंकित हैं, यह तिथियाँ कालक्रम को स्पष्ट करने में काफी उपयोगी हैं। इन स्त्रोतों से प्राचीनकाल की वास्तुकला शैली के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
भारत में कई धर्मों का उद्भव व विकास होने के कारण धार्मिक मूर्तियाँ काफी प्रचलं में रही हैं। मूर्तियाँ प्राचीन काल की धार्मिक व्यवस्था, संस्कृति एवं कला के बारे में जानकारी प्राप्त करने का महत्वपूर्ण साधन है। प्राचीन भारत में सारनाथ, भरहुत, बोधगया और अमरावती मूर्तिकला के मुख्य केंद्र थे। विभिन्न मूर्तिकला शैलियों में गांधार कला तथा मथुरा कला प्रमुख हैं।
मृदभांड का प्रकार समय के साथ साथ परिवर्तित होता गया, सिन्धु घाटी सभ्यता में लाल मृदभांड, उत्तरवैदिक काल में चित्रित धूसर मृदभांड जबकि मौर्य काल में काले पॉलिश किये गए मृदभांड प्रचलित थे। मृदभांड के प्रकार व रूप में नवीनता व प्रगति अलग अलग समयकाल में हुई।
चित्रकला से प्राचीनकाल के समाज व व्यवस्थाओं के बारे में विविध जानकारी प्राप्त होती है। चित्रों के माध्यम से प्राचीन समय के लोगो के जीवन, संस्कृति तथा कला की जानकारी मिलती है। मध्य प्रदेश में स्थित भीमबेटका की गुफाओं के चित्र से प्राचीनकाल की सांस्कृतिक विविधता का आभास होता है।लिखे गए हैं। जैन धर्म साहित्य में में आगम काफी महत्वपूर्ण हैं, इसके 12 अंग, 12 उपांग, 10 प्रकीर्ण व 6 छेद सूत्र हैं।
इनकी रचना जैन धर्म के श्वेताम्बर सम्प्रदाय के आचार्यों द्वारा की गयी थी। इनकी रचना प्राकृत, संस्कृत तथा अपभ्रंश में की गयी है। जैन धर्म के ग्रंथों का संकलन 6वीं शताब्दी में गुजरात के वल्लभी नगर ने किया गया। अन्य मुख्य जैन ग्रन्थ आचारांगसूत्र, भगवती सूत्र, परिशिष्टपर्वन व भाद्रबाहुचरित हैं।
2.गैर–धार्मिक साहित्य
धर्म के अलावा अन्य साहित्य को धर्मेत्तर साहित्य कहा जाता है। इसमें ऐतिहासिक पुस्तकें, जीवनी, वृत्तांत इत्यादि शामिल हैं। गैर-धार्मिक साहित्य में विद्वानों व कूटनीतिज्ञों की रचनाएँ प्रमुख है। यह साहित्य अपेक्षाकृत सटीक है। इससे प्राचीन राज्यों में विद्यमान राजव्यवस्था, अर्थवयवस्था, लोगों की जीवनशैली तथा तत्कालीन समाज के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है।
6वीं शताब्दी में पाणिनि एक प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान था।पाणिनी द्वारा रचित “अष्टाध्यायी” संस्कृत व्याकरण है, इसमें 5वीं शताब्दी ईसा पूर्व के समाज पर प्रकाश डाला गया है। मौर्यकाल में कौटिल्य की पुस्तक “अर्थशास्त्र” से शासन व्यवस्था की महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है। विशाखदत्त द्वारा रचित “मुद्राराक्षस”, सोमदेव द्वारा रचित “कथासरितसागर” तथा क्षेमेद्र द्वारा रचित “वृहतकथामंजरी” से मौर्यकाल के बारे में काफी जानकारी मिलती है। इन पुस्तकों में तत्कालीन धार्मिक, आर्थिक व सामाजिक व्यवस्था सभी पहलुओं के बारे में पता चलता है।
पतंजलि द्वारा रचित “महाभाष्य” तथा कालिदास द्वारा रचित “मालविकाग्निमित्र” से शुंग वंश के इतिहास के बारे में ज्ञात होता है। शूद्रक द्वारा रचित “मृच्छकटीकम” तथा दंडी द्वारा रचित “दशकुमारचरित” से गुप्तकाल की सामजिक व्यवस्था पर प्रकाश पड़ता है। बाणभट्ट द्वारा लिखी गयी हर्षवर्धन की जीवनी “हर्श्चारिता” में सम्राट हर्षवर्धन का गुणगान किया गया है। जबकि वाकपति द्वारा रचित “गौडवाहो” में कन्नौज के शासक यशोवर्मन और विल्हण के “विक्रमांकदेवचरित” में कल्याणी के चालुक्य शासक विक्रमादित्य षष्ठ की उपलब्धियों का गुणगान किया गया है।
संध्याकरनंदी की रामचरितमानस में पाल राजा रामपाल की उपलब्धियों का वर्णन है। हेमचन्द्र द्वारा रचित “द्वयाश्रय काव्य” में गुजरात के शासक कुमारपाल की उपलब्धियों का गुणगान किया गया है। पद्मगुप्त की “नवसहसांकचिरत” में परमार वंश तथा जयानक की “पृथ्वीराज विजय” में पृथ्वीराज चौहान का वर्णन है। कल्हण द्वारा लिखित “राजतरंगिनी” भारतीय इतिहास की कालक्रम के लिए अति महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसमें विभिन्न राज्यों की वंशावलियों का विस्तृत वर्णन किया गया है। यह पुस्तक 12वीं शताब्दी में कल्हण द्वारा लिखी गयी थी। इसके कुल 8 अध्याय हैं।
दक्षिण भारत के इतिहास के सम्बन्ध में संगम साहित्य से जानकारी प्राप्त होती है। यह साहित्य अधिकतर तमिल और संस्कृत में है। संगम साहित्य में चोल, चेर तथा पांड्य शासनकाल की सामाजिक व्यवस्था, अर्थव्यवस्था तथा संस्कृति इत्यादि का विस्तृत वर्णन है। उसके बाद के इतिहास की जानकारी नंदिक्कलम्ब्कम, कलिंगतुपर्णी, चोलचरित इत्यादि से प्राप्त होती है।iii) विदेशी स्त्रोत
विदेशी साहित्य से भी भारत के प्राचीन इतिहास के बारे में काफी जानकारी मिलती है। यह विदेशी लेखक विदेशी राजाओं के साथ भारत आये अथवा भारत की यात्रा पर आये, जिसके उपरान्त उन्होंने भारत की सामाजिक, आर्थिक तथा भौगोलिक व्यवस्था का वर्णन किया। विदेशी साहित्यिक स्त्रोतों को 3 भागों में बांटा जा सकता है – यूनानी व रोम के लेखक, चीनी लेखक तथा अरबी लेखक।
रोम व यूनानी लेखक
हेरोडोटस व टिसियस का वर्णन यूनानी लेखकों में सबसे प्राचीन है। हेरोडोटस ने “हिस्टोरिका” नामक पुस्तक लिखी थी, इस पुस्तक भारत और फारस के संबंधो पर प्रकाश डाला गया था, हेरोडोटस को इतिहास का पिता भी कहा जाता है।यूनानी शासक सिकंदर के साथ काफी यूनानी लेखक भारत आये, इनमे नियार्कस, आनासिक्रटस, अरिस्तोबुल्स के वृतांत महत्वपूर्ण हैं। अरिस्तोबुल्स ने “हिस्ट्री ऑफ़ द वॉर” नामक पुस्तक लिखी, जबकि आनासिक्रटस ने सिकंदर की जीवनी लिखी। सिकंदर के बाद मेगस्थनीज, डायमेकस तथा डायनोसीयस का योगदान भी महत्वपूर्ण है। मेगास्थनीज़ के प्रसिद्ध पुस्तक इंडिका में मौर्यकालेन समाज, प्रशासन व संस्कृति का वर्णन है। प्लिनी की पुस्तक “नेचुरल हिस्टोरिका” में भारत की वनस्पति, पशुओं तथा खनिज पदार्थों के साथ-साथ भारत और इटली के मध्य व्यापारिक संबंधों का उल्लेख भी देखने को मिलता है। टालेमी द्वारा रचित “जियोग्राफी” तथा प्लूटार्क व स्ट्राबो की पुस्तकों में भी भारत के विभिन्न पहलुओं का विवरण दिया गया है।
चीनी लेखक
चीनी मुख्यतः भारत में धार्मिक यात्रा के उद्देश्य से आये थे। वे मुख्यतः बौद्ध धर्म का अध्ययन करने के उद्देश्य से भारत आये। चीन से भारत आने वाले यात्रियों में फाह्यान, ह्वेन्त्सांग तथा इत्सिंग प्रमुख हैं। फाह्यान चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में भारत आया, उसने अपनी पुस्तक “फ़ो-क्यों-की” में भारतीय समाज, राजनीती तथा संस्कृति का वर्णन किया है। ह्वेन्त्सांग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया, उसने अपने यात्रा वृत्तांत में भारत की आर्थिक व सामाजिक स्थिति पर प्रकाश डाला। तिब्बती लेखक तारानाथ ने अपनी पुस्तक “कंग्यूर” “तंग्युर” में भारतीय इतिहास पर प्रकाश डाला है।
अरबी लेखक
अरबी लेखक मुस्लिम आक्रान्ताओं के साथ भारत आये।आठवीं शताब्दी में अरब शासकों ने भारत पर आक्रमण शुरू कर दिए, अरब शासकों के साथ उनके लेखक व कवि भी भारत आये। 9वीं सदी में सुलेमान भारत आया, उसने पाल और प्रतिहार राजाओं के बारे में लिखा है। अलमसुदी ने राष्ट्रकूट राजाओं का वृतांत लिखा है। जबकि अलबरुनी ने अपनी पुस्तक “तहकीक ए हिन्द” में गुप्तकाल के पश्चात के समाज के बारे में लिखा है
पुस्तक का नाम लेखक
बुद्धचरित अश्वघोष
महाविभाषाशास्त्र वसुमित्र
कामसूत्र वात्स्यायन
मेघदूत कालिदास
नाट्यशास्त्र भरतमुनि
सूर्य सिद्धांत आर्यभट्ट
वृहतसंहिता वराहमिहिर
पञ्चतंत्र विष्णु शर्मा
रत्नावली हर्षवर्धन
पृथ्वीराजरासो चंदबरदई
मालतीमाधव भवभूति
गीत गोविन्द जयदेव
कादम्बरी बाणभट्ट
